वह सवाल जिस पर कोई खुलकर बात नहीं करता
गर्भधारण में दिक़्क़त झेल रहे ज़्यादातर दंपतियों के लिए सबसे मुश्किल हिस्सा डॉक्टर ढूँढ़ना नहीं होता — वह इस विषय के इर्द-गिर्द छाई ख़ामोशी से बाहर निकलना होता है। बाँझपन पर लगभग किसी भी दूसरी सेहत की दिक़्क़त से कम बात होती है, जबकि यह ज़्यादातर लोगों के अंदाज़े से कहीं ज़्यादा आम है। यह किसी की निजी नाकामी नहीं है, यह अकेले तनाव से नहीं होता, और यह सिर्फ़ महिलाओं की समस्या नहीं है। इन धारणाओं से बाहर निकलना ही पहले परामर्श को डर की चीज़ के बजाय सचमुच काम की चीज़ बनाता है।
चिकित्सकीय रूप से "बाँझपन" का मतलब क्या है
बाँझपन की परिभाषा है 35 से कम उम्र की महिला में बारह महीने तक नियमित, बिना किसी बचाव के संबंध के बावजूद गर्भ न ठहरना, और 35 या उससे ऊपर की महिला में छह महीने तक। यह समय-सीमा मायने रखती है, क्योंकि इसका मतलब है कि इस अवधि के शुरू में सही सलाह अक्सर सचमुच इंतज़ार करने की ही होती है — ज़्यादातर दंपतियों को साल भर के भीतर बिना किसी चिकित्सकीय दख़ल के गर्भ ठहर जाता है, और यह समय बीतने से पहले जाँच शुरू कर देने से अक्सर कुछ काम का नहीं बदलता। अगर आप इसी अवधि के भीतर हैं और चिंतित हैं, तो डॉक्टर से एक तसल्ली भरी मुलाक़ात वाजिब है — लेकिन बाँझपन की पूरी जाँच आमतौर पर उस सीमा के बाद ही शुरू की जाती है।
दोनों साथियों की जाँच ज़रूरी है — इस पर कोई समझौता नहीं
इस लेख का शायद सबसे ज़रूरी वाक्य यही है: बाँझपन के लगभग 40 से 50 प्रतिशत मामलों में कारण पुरुष की तरफ़ से होता है। (संभावित — प्रजनन चिकित्सा के कई बड़े अध्ययनों में यह आँकड़ा एक जैसा मिलता है, हालाँकि ठीक अनुपात आबादी के हिसाब से बदलता है।) ऐसी जाँच जिसमें सिर्फ़ महिला को देखा जाए और वीर्य की जाँच छोड़ दी जाए, अधूरी जाँच है — और यही एक आम वजह है कि दंपती महीनों तक ग़लत जाँचों के पीछे लगे रहते हैं। दोनों साथी आएँ। जाँच दोनों से, एक साथ शुरू होती है।
बुनियादी जाँच में असल में क्या होता है
बाँझपन की शुरुआती जाँच का मक़सद सबसे आम और सबसे आसानी से इलाज हो सकने वाले कारणों की पहचान करना है — एक ही बार में हर मुमकिन जाँच करा देना नहीं। एक ठीक-ठाक पहले क़दम की जाँच में आमतौर पर यह शामिल होता है:
महिला के लिए:
हार्मोन की तस्वीर — ख़ून की जाँचें जिनमें एफ़.एस.एच., एल.एच., ए.एम.एच. (एंटी-म्यूलेरियन हार्मोन, अंडाशय के भंडार का संकेतक), टी.एस.एच. (थायरॉइड) और प्रोलैक्टिन के स्तर देखे जाते हैं। अंडाशय, गर्भाशय और एंट्रल फ़ॉलिकल की गिनती जाँचने के लिए अल्ट्रासाउंड। अगर अंडा बन रहा हो और हार्मोन सामान्य हों, तो अगला क़दम यह देखना है कि फ़ैलोपियन नलियाँ खुली हैं या नहीं — आमतौर पर एच.एस.जी. (हिस्टेरोसैल्पिंगोग्राफ़ी) से, जो एक्स-रे आधारित जाँच है जिसमें थोड़ा-सा रंग गर्भाशय और नलियों से होकर गुज़ारा जाता है।
पुरुष के लिए:
वीर्य की जाँच — जिसमें शुक्राणुओं की गिनती, उनकी गति और उनकी बनावट देखी जाती है। यह एक सरल जाँच है जिसमें कोई चीर-फाड़ नहीं होती। यह मर्दानगी की नाप नहीं है; यह किसी भी दूसरी ख़ून की जाँच जैसी ही एक जैविक माप है। पहली वीर्य जाँच में असामान्य नतीजा आने पर कोई नतीजा निकालने से पहले हमेशा दूसरी जाँच से पुष्टि की जाती है।
जीवन ज्योति में क्या होता है और क्या रेफ़र किया जाता है
इस पर साफ़ बात कर देना ठीक है, क्योंकि आगे का रास्ता पहले से जान लेने से यह चिंता कम होती है कि अब क्या होगा।
जीवन ज्योति अस्पताल में जाँच — ख़ून की जाँचें, अल्ट्रासाउंड, चक्र की निगरानी और शुरुआती आकलन — यहीं होती है। अगर जाँच में अंडा बनने की दिक़्क़त, थायरॉइड की गड़बड़ी या हार्मोन से जुड़ा कारण सामने आता है, तो उसका इलाज यहीं होता है: अंडा बनवाने की दवा, हार्मोन का सुधार और चक्र की निगरानी — ये सब वे काम हैं जो प्रसूति एवं स्त्री रोग टीम यहीं करती है।
अगर जाँच से ऐसी बात सामने आती है जिसके लिए किसी प्रक्रिया की ज़रूरत है — आई.यू.आई., आई.वी.एफ़., या ऑपरेशन से जाँच — तो आपको ऐसी विशेषज्ञ सुविधा के पास भेजा जाएगा जहाँ उन प्रक्रियाओं के लिए ठीक इंतज़ाम है। वह रेफ़रल कोई बंद रास्ता नहीं है; उस ख़ास स्थिति के लिए वही उचित अगला क़दम है, और वह तब होता है जब पूरी जाँच पहले ही हो चुकी होती है — यानी आप जिस विशेषज्ञ से मिलते हैं वे शुरू से शुरू करने के बजाय सीधे असली फ़ैसले पर आ पाते हैं।
बारह महीने से पहले कब आना चाहिए
कुछ स्थितियाँ ऐसी हैं जहाँ मानक सीमा का इंतज़ार किए बिना जल्दी जाँच कराना समझदारी है:
- अनियमित या बहुत कम आने वाली माहवारी (पी.सी.ओ.एस. या अंडा बनने की दिक़्क़त का संभावित संकेत — इस पर हमारा अलग लेख है)
- एंडोमेट्रियोसिस, पेड़ू का पुराना संक्रमण, या प्रजनन अंगों को प्रभावित करने वाला पहले हुआ कोई ऑपरेशन
- महिला की उम्र 35 या उससे ज़्यादा हो — यहाँ छह महीने की सीमा लागू होती है
- पिछले किसी रिश्ते या चिकित्सकीय इतिहास से पुरुष की तरफ़ की कोई ज्ञात दिक़्क़त
इंतज़ार के दौरान क्या नहीं करना चाहिए
दो व्यावहारिक बातें कहने लायक़ हैं: अनौपचारिक रूप से बिकने वाले सप्लीमेंट, जड़ी-बूटी की दवाएँ और "प्रजनन बढ़ाने वाले" उत्पाद ज़्यादातर प्रमाणों से समर्थित नहीं हैं, और कभी-कभी उन्हीं हार्मोन जाँचों में दख़ल डालते हैं जिनसे सही नतीजे मिलने चाहिए — आप जो कुछ भी ले रही हों, पहली मुलाक़ात पर डॉक्टर को बता देना ठीक रहता है। और बारह महीने की सीमा बीत जाने के बाद भी यह उम्मीद करते हुए इंतज़ार खींचते रहना कि बात अपने आप सुलझ जाएगी, एक आम आदत है जो बस उस जाँच में देर कराती है जो सही वक़्त पर होती तो जल्दी और आसान होती।
सार की बात
पहला क़दम ज़्यादातर दंपतियों की उम्मीद से कहीं आसान और कम डरावना है: एक परामर्श, कुछ ख़ून की जाँचें और एक अल्ट्रासाउंड, और वीर्य की एक जाँच। ये तीनों चीज़ें मिलकर "क्यों" वाले ज़्यादातर आम सवालों का जवाब दे देती हैं, और साफ़ योजना यहीं से शुरू होती है। साथ आना, समय-सीमा के बारे में सीधी बात करना, और खुलकर पूछना कि क्या जाँचा जा रहा है और क्यों — पहली मुलाक़ात को बस इतना ही होना चाहिए।